Sunday, 20 December 2015

आरम्भ है प्रचंड....जनता के पेट और जेब पर सरकारी ताला हर दिन एक पेंच और कस रहा है!

मै नया हूं...लेकिन ख्यालात पुराने हैं...लिहाजा आप के बीच अपनी कुछ समझ का बोझ हल्का करने के लिए आ रहा हूं। सरकार लगातार ये दिखाने की कोशिशें कर रही है कि वो जनता की हितैषी और जनता का बोझ खुद उठाने की व्यवस्था करने वाली सरकार है। बावजूद इसके जनता त्राहि त्राहि कर रही है।

पुराने दिनों को याद करें (साल 2014 से पहले) तो जनता जनार्दन इतनी नशे में मदमस्त नही थी जितनी की आज आताताईयों के डर से हो गई है। हिन्दूत्व खतरे में है...क्या खाक खतरे में है बच्चों की शिक्षा नही हो पा रही है...खाने संसाधन जुटाने में परिवार के मुखिया के ना जाने कहां कहां से पसीने छूट रहे हैं। लेकिन माई बाप है कि उनको कोई फर्क ही नही पड़ रहा है। हालिया खबर है कि सरकार की व्यवस्था के कारण अब लोन पर ब्याज महंगे होने वाले हैं...हो भी क्यों ना मंदिर... हर घर झंडा...कोविड फंड इत्यादियों का खर्चा जो जनमानस को उठाना है। हमें कोई शिकवा शिकायत नही है लेकिन मन में एक सवाल रह रह कर कौंध जाता है कि क्या वाकई इनकी आवश्यक्ता है। हो सकता है कि मेरे इस लेख के कारण मुझे देश द्रोही और वैमनश्यता फैलेने वाला करार दे दिया जाए लेकिन मेरा सवाल बड़ा ही मासूम सा है। महंगाई की मार से चहुंओर हाहाकार मचा हुआ है। चंद पूंजीपति अपना गुल्लक भर रहें है जबकि देश के नौ जवानों को एक छोटी नौकरी के लिए भी बड़े बड़े के तलवे चाटने पड़ रहे हैं तो कहीं कहीं पर पापड़ भी बेलने पड़ रहा है। सरकार पर लाल फीताशाही इस कदर हावी हो गई है कि अधिकारी जो दिखाना चाहते हैं वही उनको दिखाई देता है।
हम पत्रकार हैं सो दिखाना और समझाना हमारा फर्ज भी है और नैतिक जिम्मेदारी भी लेकिन हमें भी गलत तराजू में अक्सर तौल दिया जाता है। साहब हम भी इन्सान है। पेट हमारा भी है....मै ये नही कह सरा कि मै ही शाश्वत हूं लेकिन हां मै ये जरूर कह रहा हूं कि हम सभी गलत नही है।
सरकारी नौकरशाही को रेड कॉर्पेट की आदत सी है....सो उसको समझना और समझाना उनको ही आता है जो कि बड़े पेट वाले होते हैं। दो रोटी और थोड़ा साभात खाने वाला इन्सान तो साहब के दफ्तर के कमरे के बाहर जाने से भी कतराता है कि माई बाप की भृकुटि टढ़ी ना हो जाए....ऐसे में देश का क्या ही भला होगा।
बात छोटी सी है शिक्षा व्यवस्था को लेकर हर पार्टी चुनाव में बड़े दावों के साथ ताल ठोंकती नजर आती है। लेकिन सत्ता में आने के बाद ये मुद्दे गौंड़ से हो जाते हैं। लैपटॉप का ढकोसला हो या लड़की हूं लड़ सकती हूं हो या फिर महिला शिक्षा और सम्मान की बात....साहब कभी जमीन पर उतर कर देखिए कि इस देश में शिक्षा की बोली लगती है...कितने में कौन सा स्कूल शिक्षित करता है। कमरतोड़ मोहनत के बाद एकीकृत परिवार सिर्फ शिक्षा व्यवस्था की बदहाल व्यवस्था का लप्पड़ खा कर घर द्वार त्यागने को मजबूर होता है। बूढ़े मां बाप से दूर रहकर बच्चों की तालीम पर ध्यान देने की जीतोड़ कोशिशें करता है सफल हो गया तो उसकी किस्मत हार गया तो समाज के आंखों की किरकिरी बनकर रह जाता है।
बंद एसी कमरों से निकलकर साहब आपको निकलना चाहिए और पड़ताल करनी चाहिए कि कौन सा स्कूल कितनी बेहतर शिक्षा दे रहा है....और हां कितने में दे रहा है। बड़े बड़े धन्नासेठों के आज कॉलेज-स्कूलों की कतार सी लगी हुई है। शिक्षा का व्यवसायीकरण हो चुका है। लेकिन सरकार के चुनावी वादों पर जनता फिसल जाती है और दाहिने हाथ में झंडा लेकर बाये हाथ पर चुनावी निशान लगवाने को तैयार रहती है। कैसे चलेगा ऐसे काम....और किस मुंह से इस लोकतांत्रिक व्यवस्था का समर्थन करें....जवाब दीजिए।
मैने पहले ही बोला कि मै नया हूं लेकिन आपकी कारस्तानियों पर बारीकी से नजरें जमाए बैठा हुआ हूं।
किससे कहूं अपनी व्यथा किसके पास जाकर रोऊं....आपको सत्ता में लाने के लिए एक वोट मेंरा भी था लेकिन आपकी टीम और व्वस्था देखकर मन द्रवित है कुंठित है। मै जानता हूं कि जवाब कोई नही मिलने वाला है लेकिन बच्चों की शिक्षा को लेकर मन आक्रोशित हो जाता है। ये वही देश है जहां पर बड़े बड़े नारों के बलों पर सरकारें बनती और बिगड़ती है...ये वही देश है जहां पर नमक के दाम बढ़ने पर सरकार गल जाती है ....ये वही देश है जहां पर ऑक्सीजन की कमी के कारण जान चली जाती है। लेकिन आप पर तो कोई फर्क ही नही पड़ता है जनाब क्योकि मोटी चमड़ी तो ठीक थी आपने उसपर भी सरसों का तेल (जो केवल आप जैसे ही पोत सकते हैं हमारे लिए तो इसकी कीमत भी आसमान को निहारने से कम नही है) लगाए बैठे हैं।
इतने निष्ठुर मत बनिए....सम्मान बहुत है....नफरत भी उतनी ही करूंगा..... याद है ना कि ज्यादा मीठे में ही कीड़े पड़ते हैं।  

3 comments:

  1. कृपया मेरी खबर को पढ़िए और बहुमूल्य सुझाव दीजिए

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