Saturday, 6 August 2022

महंगाई के रामायण ने जीवन में महाभारत खड़ा कर दिया है !

 हाय रे महंगाई....मार कर खा जाओगी क्या...

कहानी पढ़िए इससे आपके माथे के बल कम होंगे.....  आलू, प्याज, टामाटर, हरी मिर्च के साथ नींबू ने अपनी हैसियत का अंदाजा लगवाने के लिए सरकार से गुहार लगाई थी। ये आम जनता के आम ही भोजन थे, जिनको इंसान तो खाता ही थी बचने पर गाय गोरू भी चख लिया करते थे। भाजपा की सरकार आई तो एक अच्छी बात यूं हुई कि, गाय मैया को खोया हुआ सम्मान मिल गया। बैल और बछड़ों को खुला चारागाह (किसानों के खेत) मिल गया। बाकी जानवों के जीवन में भी थोड़ा उछाल आ गया। कुछ चिड़िया घरों की शोभा बनें तो कुछ खुले आकाश में विचरित होने लगे। लेकिन सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा तो वो था दो पैरों वाला जानवर यानी इंसान....थाली में जो डॉक्टर की राय से सलाद का सेवन ज्यादा करते थे उनको अब 'सेवन डेज' उस टाईप की थाली ही मयस्सर नही होती है।

एक मशहूर ग़ज़ल है....सीने में जलन आँखों में तुफान सा क्यों है...इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है......!

आलू ने सरकार के साथ मिलकर अपने पुराने पापों का प्रायस्चित किया और महंगा हो लिया। प्याज समय समय पर आम जनता के कानों में रूदाली फिल्म के गीत (दिल हूम हूम करे...) गुनगुना ही जाता है। इस बार तो नींबू ने तो कमाल ही कर दिया। खट्टा होने के बावजूद बाजार के सेंसेक्स पर दम लगाकर लम्बी छलांग मारी दे दिया सबको पठखनी। विपक्षी नींबू जो लोगों के खाने में कभी कभार ही शुमार होता था कोरोनाकाल में अपनी उपस्थिति को दर्ज करवाया...बस फिर क्या था अब वो सरकार की नजरों में था। 

सरकार माई बाप को लगा कि ये अगर विपक्ष में होने के बावजूद क्रॉस वोटिंग करने को बेकरार है तो इसको लोकतंत्र की हिस्सेदारी में भागीदार बनाया जाए....बस अब सरकार के साथ आम लोगों के भोजन की थाली सजाने वाले वो सभी अवयव मौजूद हो गए....जनता किसान खेत में मेहनत करे तो बछड़े और सांड उसका उपभोग करने लगे। मेहनत के पसीनों को जब वो गार कर घर लौटता तो थाली इतनी खाली होती की उसमे माथे पर शिकन वाली परेशान सी सूरत दिखाई दे रही है।

सरकार रामायण काल के अवशेषों को समाहित करने में जी तोड़ मेहनत कर रही है। जबकि प्रचार प्रसार में कोई कोर कसर न रह जाए इसके लिए भारी भरकम बजट का इस्तेमाल भी ताबड़तोड़ कर रही है।

जनता की सुधि लेने वाला कोई नही है। वोट करो तो किसी पार्टी के समर्थक के तौर पर जाना जाता है नही करो तो लोकतंत्र का विरोधी बताया जाता है।

सरकार बताईए न कहां चले जाएं...जहां आपकी सूरत देखनी न पड़े.....

आध्यात्म में बड़ी शक्ति होती है और आस्था तो प्रबल है उसका कोई कुछ नही बिगाड़ सकता है। खुद ही जांच लिजिए सरकार हमारी आस्था पर बन गई और सरकारी चाशनी में चवन्नी दबाकर हमलोग मदमस्त है।

एक किसी बड़े व्यक्ति ने कहा था कि जनता को ऐसा बनाकर रखो को कि, जीवित होने को ही वो अपना विकास समझे....ये बात तब समझ के परे थी लेकिन आज हम सब उसको कमोबेश सभी लोग जी रहे हैं। 

देश काल और परिस्थितियों के द्वारा जनित हादसे सभी के साथ होते हैं लेकिन उससे संरक्षण के लिए ही तो हमलोग लोकतंत्र के छाते को तानकर खड़े रहते हैं। 

देश में महंगाई कोई मुद्दा नही है ठीक वैसे ही जैसे किसी भी नौकरी के लिए हिंदी भाषा उतनी जरूरी नही है जितनी अंग्रेजी स्किल का आना महत्वपूर्ण होता है। वित्त मंत्री वाली अम्मा को वित्त से मतलब तो है लेकिन उससे जनता को जो पित्त बन रहा है उसका कोई लेना देना नही है। 

मने क्या कहें...किससे कहें....कोईसुनने वाला ही तो नही है.... क्योंकि इस देश में या तो राग दरबारी बचे हैं और नही तो पीड़ितों की पंक्ति खड़ी है।

दर्द तो बहुत है कहने के लिए कोई था नही तो सोचा कि पेज ब्लॉग ही लिखकर मन हल्का कर लें।



Sunday, 20 December 2015

भारत देश दुनिया का सबसे बड़ा बाजार...ऐसा बचपन से ही हम सोचते रहे हैं। जबकि सियासी दलों ने भी विकास के नाम पर कहीं ना कहीं दुनिया का सबसे बड़ा बाजार वाले स्लोगन का ही तवा अपनी सियासी रोटी सेंकने के लिए किया है। लेकिन क्या हमने कभी सोंचा हैं कि सभी ऐसा कहते क्यों हैं....ऐसा इसलिए है क्योंकि सबसे सस्ता लेबर मन लगाकर और डर के साथ अपनी नोौकरी को बचाने की जद्दोजहद में भारतीय पूरी तल्लीनता और तमयता के साथ कंपनी के उत्थान और अपने परिवार के लिए दो जून की रोटी के जुटाने में लग जाता है। यहां पर विकासपरक सोंच नही है। सबकी सोंच यही है कि एक अदद नौकरी मिल जाए तो जीवन को सफल माना जाए।
हालांकि सही भी है...क्योकि यहां पर अलग कुछ करना या उसकी कोशिश करने वालों को समाज झेलता नही है। इतने लेख का यही मकसद था कि कृपया अपनी जिम्मेदारियो को समझिए...देश का उत्थान मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी से नही चलने वाला ...देश के लिए कुछ करो सरकार...ऐसा करो कि देश दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बने लेकिन उसने भारत में बनने वाली साजो सामानों की धूम हो...वरना फिर कोई बिचौलिया आएगा और हमारे देश की खुशियां लूट ले जाएगा।
कुछ करिए सरकार....अब उठिए सरकार

आरम्भ है प्रचंड....जनता के पेट और जेब पर सरकारी ताला हर दिन एक पेंच और कस रहा है!

मै नया हूं...लेकिन ख्यालात पुराने हैं...लिहाजा आप के बीच अपनी कुछ समझ का बोझ हल्का करने के लिए आ रहा हूं। सरकार लगातार ये दिखाने की कोशिशें कर रही है कि वो जनता की हितैषी और जनता का बोझ खुद उठाने की व्यवस्था करने वाली सरकार है। बावजूद इसके जनता त्राहि त्राहि कर रही है।

पुराने दिनों को याद करें (साल 2014 से पहले) तो जनता जनार्दन इतनी नशे में मदमस्त नही थी जितनी की आज आताताईयों के डर से हो गई है। हिन्दूत्व खतरे में है...क्या खाक खतरे में है बच्चों की शिक्षा नही हो पा रही है...खाने संसाधन जुटाने में परिवार के मुखिया के ना जाने कहां कहां से पसीने छूट रहे हैं। लेकिन माई बाप है कि उनको कोई फर्क ही नही पड़ रहा है। हालिया खबर है कि सरकार की व्यवस्था के कारण अब लोन पर ब्याज महंगे होने वाले हैं...हो भी क्यों ना मंदिर... हर घर झंडा...कोविड फंड इत्यादियों का खर्चा जो जनमानस को उठाना है। हमें कोई शिकवा शिकायत नही है लेकिन मन में एक सवाल रह रह कर कौंध जाता है कि क्या वाकई इनकी आवश्यक्ता है। हो सकता है कि मेरे इस लेख के कारण मुझे देश द्रोही और वैमनश्यता फैलेने वाला करार दे दिया जाए लेकिन मेरा सवाल बड़ा ही मासूम सा है। महंगाई की मार से चहुंओर हाहाकार मचा हुआ है। चंद पूंजीपति अपना गुल्लक भर रहें है जबकि देश के नौ जवानों को एक छोटी नौकरी के लिए भी बड़े बड़े के तलवे चाटने पड़ रहे हैं तो कहीं कहीं पर पापड़ भी बेलने पड़ रहा है। सरकार पर लाल फीताशाही इस कदर हावी हो गई है कि अधिकारी जो दिखाना चाहते हैं वही उनको दिखाई देता है।
हम पत्रकार हैं सो दिखाना और समझाना हमारा फर्ज भी है और नैतिक जिम्मेदारी भी लेकिन हमें भी गलत तराजू में अक्सर तौल दिया जाता है। साहब हम भी इन्सान है। पेट हमारा भी है....मै ये नही कह सरा कि मै ही शाश्वत हूं लेकिन हां मै ये जरूर कह रहा हूं कि हम सभी गलत नही है।
सरकारी नौकरशाही को रेड कॉर्पेट की आदत सी है....सो उसको समझना और समझाना उनको ही आता है जो कि बड़े पेट वाले होते हैं। दो रोटी और थोड़ा साभात खाने वाला इन्सान तो साहब के दफ्तर के कमरे के बाहर जाने से भी कतराता है कि माई बाप की भृकुटि टढ़ी ना हो जाए....ऐसे में देश का क्या ही भला होगा।
बात छोटी सी है शिक्षा व्यवस्था को लेकर हर पार्टी चुनाव में बड़े दावों के साथ ताल ठोंकती नजर आती है। लेकिन सत्ता में आने के बाद ये मुद्दे गौंड़ से हो जाते हैं। लैपटॉप का ढकोसला हो या लड़की हूं लड़ सकती हूं हो या फिर महिला शिक्षा और सम्मान की बात....साहब कभी जमीन पर उतर कर देखिए कि इस देश में शिक्षा की बोली लगती है...कितने में कौन सा स्कूल शिक्षित करता है। कमरतोड़ मोहनत के बाद एकीकृत परिवार सिर्फ शिक्षा व्यवस्था की बदहाल व्यवस्था का लप्पड़ खा कर घर द्वार त्यागने को मजबूर होता है। बूढ़े मां बाप से दूर रहकर बच्चों की तालीम पर ध्यान देने की जीतोड़ कोशिशें करता है सफल हो गया तो उसकी किस्मत हार गया तो समाज के आंखों की किरकिरी बनकर रह जाता है।
बंद एसी कमरों से निकलकर साहब आपको निकलना चाहिए और पड़ताल करनी चाहिए कि कौन सा स्कूल कितनी बेहतर शिक्षा दे रहा है....और हां कितने में दे रहा है। बड़े बड़े धन्नासेठों के आज कॉलेज-स्कूलों की कतार सी लगी हुई है। शिक्षा का व्यवसायीकरण हो चुका है। लेकिन सरकार के चुनावी वादों पर जनता फिसल जाती है और दाहिने हाथ में झंडा लेकर बाये हाथ पर चुनावी निशान लगवाने को तैयार रहती है। कैसे चलेगा ऐसे काम....और किस मुंह से इस लोकतांत्रिक व्यवस्था का समर्थन करें....जवाब दीजिए।
मैने पहले ही बोला कि मै नया हूं लेकिन आपकी कारस्तानियों पर बारीकी से नजरें जमाए बैठा हुआ हूं।
किससे कहूं अपनी व्यथा किसके पास जाकर रोऊं....आपको सत्ता में लाने के लिए एक वोट मेंरा भी था लेकिन आपकी टीम और व्वस्था देखकर मन द्रवित है कुंठित है। मै जानता हूं कि जवाब कोई नही मिलने वाला है लेकिन बच्चों की शिक्षा को लेकर मन आक्रोशित हो जाता है। ये वही देश है जहां पर बड़े बड़े नारों के बलों पर सरकारें बनती और बिगड़ती है...ये वही देश है जहां पर नमक के दाम बढ़ने पर सरकार गल जाती है ....ये वही देश है जहां पर ऑक्सीजन की कमी के कारण जान चली जाती है। लेकिन आप पर तो कोई फर्क ही नही पड़ता है जनाब क्योकि मोटी चमड़ी तो ठीक थी आपने उसपर भी सरसों का तेल (जो केवल आप जैसे ही पोत सकते हैं हमारे लिए तो इसकी कीमत भी आसमान को निहारने से कम नही है) लगाए बैठे हैं।
इतने निष्ठुर मत बनिए....सम्मान बहुत है....नफरत भी उतनी ही करूंगा..... याद है ना कि ज्यादा मीठे में ही कीड़े पड़ते हैं।